वर्चुअल कोर्ट (Virtual Court): ऑनलाइन न्यायिक सेवाएं: Know in Easy Language

आधुनिक तकनीकी प्रगति ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में क्रांति की है, और इसका असर न्यायिक प्रणाली में भी महत्वपूर्ण रूप से दिख रहा है। “वर्चुअल कोर्ट (Virtual Court)” एक ऐसा नया पहलु है जो न्यायिक प्रक्रिया को इंटरनेट के माध्यम से समायोजित करने का प्रयास कर रहा है। इस लेख में, हम जानेंगे कि वर्चुअल कोर्ट क्या हैं, यह काम कैसे करती है, क्यों इसकी जरुरत पड़ी, इसके फायदे और नुक्सान, और इसकी वर्तमान स्थिति क्या है।

वर्चुअल कोर्ट (Virtual Court) क्या हैं?

वर्चुअल अदालतें, जिन्हें ऑनलाइन अदालतें भी कहा जाता हैं, यह एक नए प्रकार की न्यायिक सेवा हैं जो इंटरनेट के माध्यम से संचालित होती हैं। इसमें न्यायिक प्रक्रिया को विचार करने और निर्णय देने के लिए इंटरनेट चैम्बर्स का उपयोग होता है, जिसमें वकील, न्यायाधीश और प्रतिबंधक इंटरनेट के माध्यम से जुड़े होते हैं।

छोटे यातायात अपराधों से निपटने के लिए वर्चुअल कोर्ट को उपयोग में लाया गया है। इसका मुख्य उदेश्य कोर्ट में लोगो की भीड़ को कम करना है। इसमें सुनवाई ऑनलाइन द्वारा की जाती है जिससे की समय और जनशक्ति की बचत होती है।

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What is Virtual Court

वर्चुअल अदालतें कैसे काम करती हैं?

वर्चुअल अदालतें कैसे काम करती हैं, इसके लिए हम निचे कुछ पॉइंट बता रहे है जो कुछ इस प्रकार है-

  1. मुकदमा ऑनलाइन दर्ज और सुनवाई: मुकदमे की शुरुआत ऑनलाइन दर्ज से होती है, जिसमें व्यक्ति अपने मुकदमे को ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर दर्ज करता है। इसके बाद, एक समय सीमा के अंदर, ऑनलाइन सुनवाई का समय निर्धारित किया जाता है।
  2. विचार-विमोचन की प्रक्रिया: व्यक्ति और उनके वकील इंटरनेट चैम्बर्स के माध्यम से ऑनलाइन जुड़ते हैं, जहां न्यायिक प्रक्रिया की चर्चा होती है। साक्षात्कार और सुनवाई भी इंटरनेट प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से होती हैं, जिससे विचार-विमोचन की प्रक्रिया सुगम बनती है।
  3. इलेक्ट्रॉनिक श्रृंगार: सभी न्यायिक दस्तावेज़ और साक्षात्कार इलेक्ट्रॉनिक रूप से संरचित होते हैं, जो पेपरलेस न्याय को प्रोत्साहित करता है।
    इससे प्रक्रिया में तेजी होती है और लोग आसानी से अपने न्यायिक दस्तावेज़ को संबोधित कर सकते हैं।
  4. निर्णय और न्यायिक प्रक्रिया: न्यायिक प्रक्रिया के अंत में, न्यायाधीश ऑनलाइन दिए गए तथ्यों और साक्षात्कार के आधार पर निर्णय देते हैं।
    यह निर्णय भी इंटरनेट के माध्यम से व्यक्तिगत और न्यायिक प्रक्रिया के सभी प्रतिभागियों को सूचित किया जाता है।
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इस प्रकार, वर्चुअल अदालतें न्यायिक प्रक्रिया को इंटरनेट पर संचालित करने के लिए एक इंटीग्रेटेड और सुरक्षित तंत्र प्रदान करती हैं। यह न्यायिक सेवाओं को और भी आसान और सुगम बनाने का प्रयास कर रही है, साथ ही आम लोगों को भी न्याय से जुड़ने में आसानी प्रदान कर रही है।

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वर्चुअल अदालतों की क्यों जरुरत पड़ी?

वर्चुअल अदालतें की आवश्यकता कई कारणों से उत्पन्न हुई है, और इन्हें अनुकरण करने के लिए कई मुख्य कारण हैं:

  • तकनीकी प्रगति: तकनीकी प्रगति ने डिजिटल युग में हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है। इंटरनेट का संप्रेषण व्यापक हो गया है, और इसका उपयोग न्यायिक प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए किया जा रहा है।
  • आसानी से सुनवाई: वर्चुअल अदालतें लोगों को अपने मुकदमों की सुनवाई के लिए तय किए गए समय पर अपने घर से ही जुड़ने का अवसर देती हैं, जिससे लोगों की न्यायिक सेवाओं तक पहुंचने में आसानी होती है।
  • तेज न्यायिक प्रक्रिया: वर्चुअल अदालतें न्यायिक प्रक्रिया में तेजी और दक्षता लाती हैं, क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया को संभालना आसान हो जाता है।
  • ओवरलोड न्यायिक सिस्टम: बढ़ती हुई मुकदमों की संख्या के कारण जो न्यायिक सिस्टम ओवरलोड हो गया है, वर्चुअल अदालतें इस समस्या का समाधान कर सकती हैं।
  • यातायात और समय की बचत: लोग अपने घर से ही वर्चुअल अदालतों के माध्यम से सुनवाई के लिए जुड़ सकते हैं, जिससे यातायात और समय की बचत होती है।

इन सभी कारणों से, वर्चुअल अदालतें को न्यायिक सेवाओं को सुगम बनाने और लोगों को आसानी से न्यायिक प्रक्रिया में जुड़ने का एक सुगम और उपयुक्त तंत्र माना जा रहा है।

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वर्चुअल अदालतों के फायदे और नुक्सान क्या है?

वर्चुअल अदालतों के फायदे भी है और कुछ नुक्सान भी है। हम इनको क्रमबद्ध बताते है-

वर्चुअल अदालतों के फायदे:

  • यातायात और समय की बचत: लोग अपने घर से ही सुनवाई के लिए जुड़ सकते हैं, जिससे यात्रा की जरुरत नहीं होती है और समय भी बचता है।
  • तेज न्यायिक प्रक्रिया: इनमें सुनवाई और निर्णय तेजी से हो सकते हैं, क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से सभी जुड़े होते हैं और पेपरलेस प्रक्रिया होती है।
  • ओवरलोड न्यायिक सिस्टम का समाधान: वर्चुअल अदालतें ओवरलोड न्यायिक सिस्टम को कम करने में मदद कर सकती हैं, क्योंकि इसमें ऑनलाइन तंत्र का उपयोग होता है।

वर्चुअल अदालतों के नुक्सान:

  • तकनीकी समस्याएं: ऑनलाइन प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ी उत्पन्न हो सकती है, जो सुनवाई को अवरुद्ध कर सकती है।
  • गोपनीयता की समस्या: ऑनलाइन माध्यम की सुरक्षा समस्याएं हो सकती हैं, जिससे व्यक्ति की गोपनीयता पर संदेह बना रहता है।
  • व्यक्तिगत संपर्क की कमी: विचार-विमोचन में व्यक्तिगत संपर्क की कमी होती है, जिससे अधिक संबंध और समझदारी की कमी हो सकती है।
  • ऑफलाइन प्रक्रिया की अवस्था: वर्चुअल अदालतों का पूरी तरह से ऑनलाइन होने के कारण, जब तक इंटरनेट कनेक्शन है, तब तक सुनवाई हो सकती है।

इन फायदों और नुक्सानों को ध्यान में रखकर वर्चुअल अदालतें का सही से उपयोग किया जा सकता है ताकि लोगों को न्यायिक सेवाओं का और भी अच्छा अनुभव हो।

भारत में वर्चुअल अदालतों की स्थिति क्या है?

doj.gov.in के अनुसार 30.09.2023 तक भारत में 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों अर्थात दिल्ली (2), हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल (2), महाराष्ट्र (2), असम, छत्तीसगढ़, जम्मू और कश्मीर (2), उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मेघालय, त्रिपुरा, चंडीगढ़, उत्तराखंड पश्चिम बंगाल, गुजरात(2) और हिमाचल प्रदेश इन सबको मिलाकर कुल 25 वर्चुअल अदालतें हैं।

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इन 25 वर्चुअल अदालतों द्वारा 3.76 करोड़ से अधिक की सुनवाई की गई। doj.gov.in के अनुसार 30.09.2023 तक 43 लाख से अधिक मुकदमो में 455.12 करोड़ रुपए से अधिक का ऑनलाइन जुर्माने की वसूली की गई है।

नोट:- ये सभी आकड़े doj.gov.in से लिए गए है।

वर्चुअल कोर्ट (Virtual Court) पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल- FAQs

उत्तर:- वर्चुअल कोर्ट एक ऑनलाइन न्यायिक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य न्यायिक सेवाओं को सुगम और तकनीकी बनाए रखना है। इसमें लोग अपने छोटे यातायात के मुकदमों को इंटरनेट के माध्यम से सुनवाई के लिए दर्ज करा सकते हैं।

उत्तर:- वर्चुअल कोर्ट में, लोग अपने छोटे यातायात के मुकदमों को ऑनलाइन दर्ज करके सुनवाई के लिए तैयारी करते हैं। इसके बाद, न्यायाधीश और प्रतिभागी ऑनलाइन मीटिंग्स के माध्यम से बातचीत करके निर्णय देते हैं।

  • लोग अपने घर से ही सुनवाई के लिए जुड़ सकते हैं।
  • न्यायिक प्रक्रिया में तेजी होती है।
  • समय और जनशक्ति की बचत होती है।
  • ओवरलोड न्यायिक सिस्टम को कम करने में मदद करती है।
  • तकनीकी समस्याएं आ सकती हैं।
  • व्यक्तिगत संपर्क की कमी हो सकती है।
  • ऑनलाइन प्रक्रिया में अवरोध हो सकता है।

उत्तर:- सुनवाई का समय वर्चुअल कोर्ट पर किए जाने वाले मुकदमों की संख्या और अन्य कारगर कारणों पर निर्भर करता है।

उत्तर:- doj.gov.in के अनुसार 30.09.2023 तक भारत में 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल मिलाकर 25 वर्चुअल अदालतें हैं।

समाप्ति:

वर्चुअल कोर्ट (Virtual Court) एक नया क्षेत्र है जो न्यायिक प्रक्रिया में तकनीकी परिवर्तन लाने का प्रयास कर रहा है। इसके फायदे और नुक्सानों को मध्यस्थ करते हुए, यह साबित हो रहा है कि इससे न्यायिक सेवाएं और भी सुगम हो सकती हैं। आने वाले समय में, वर्चुअल अदालतों का और विकास होने की संभावना है और इससे न्यायिक प्रक्रिया को और भी सुविधाजनक बनाने का कारण हो सकता है।

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