भारतीय न्याय संहिता 2 क्या है? – Bharatiya Nyaya Sanhita 2 in Hindi & English

Bharatiya Nyaya Sanhita 2 in Hindi – BNS 2 in Hindi

परिभाषाएं, इस संहिता में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(1) “कार्य”- “कार्य” शब्द कार्यावली का द्योतक उसी प्रकार है, जिस प्रकार एक कार्य का;

(2) “जीवजन्तु” शब्द मानव से भिन्न किसी जीवधारी अभिप्रेत है;

(3) “कूटकरण” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो एक चीज को दूसरी चीज के सदृश इस आशय से करता है कि वह उस सदृश से प्रबंधना करे, या यह संभाव्य जानते हुए करता है कि तद्द्वारा प्रबंधना की जाएगी, वह “कूटकरण” करता है, यह कहा जाता है;

स्पष्टीकरण 1- कूटकरण के लिए यह आवश्यक नहीं है कि नकल ठीक वैसी ही हो।

स्पष्टीकरण 2- जब कि कोई व्यक्ति एक चीज को दूसरी चीज के सदृश कर दे और सादृश्य ऐसा है कि तद्द्वारा किसी व्यक्ति को प्रबंधना हो सकती हो, तो जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न किया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि जो व्यक्ति एक चीज को दूसरी चीज के इस प्रकार सदृश बनाता है उसका आशय उस सदृश द्वारा प्रबंधना करने का था या वह यह सम्भाव्य जानता था कि तदद्वारा प्रबंधना की जाएगी;

(4) “न्यायालय” शब्द उस न्यायाधीश का, जिसे अकेले ही को न्यायिकत; कार्य करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो, या उस न्यायाधीश निकाय का, जिसे एक निकाय के रूप में न्यायिकतः कार्य करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो, जबकि ऐसा न्यायाधीश या ज्यायाधीश निकाय न्यायिकत कार्य कर रहा हो, अभिप्रेत है;

(5) “मृत्यु” जब तक कि संदर्भ के तत्प्रतिकूल प्रतीत न हो, “मृत्यु” शब्द मानव की मृत्यु का द्योतक है;

(6) “बेईमानी” से जो कोई इस आशय से कोई कार्य करता है कि एक व्यक्ति को सदोष अभिलाभ कारित करे या अन्य व्यक्ति को सदोष हानि कारित करे, वह उस कार्य को करता है, यह कहा जाता है, अभिप्रेत है;

(7) “दस्तावेज” शब्द कोई भी विषय का अभिप्रेत है जिसको किसी पदार्थ पर अक्षरों, अंकों या चिह्न के साधन द्वारा या उनसे एक से अधिक साधनों द्वारा अभिव्यक्त या वर्णित किया गया हो जो उस विषय के साक्षी के रूप में उपयोग किए जाने को आशयित हो या उपयोग किया जा सके;

स्पष्टीकरण 1- यह तत्वहीन है कि किस साधन द्वारा या किस पदार्थ पर अक्षर, अंक या चिह्न बनाए गए हैं, या यह कि साक्ष्य किसी न्यायालय के लिए आशयित है या नहीं, या उसमें उपयोग किया जा सकता है या नहीं।

दृष्टांत-

  • (क) किसी संविदा के निबन्धनों को अभिव्यक्त करने वाला लेख, जो उस संविदा के साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जा सके, दस्तावेज है।
  • (ख) बैंककार पर दिया गया चेक दस्तावेज है।
  • (ग) मुख्तारनामा दस्तावेज है।
  • (घ) मानचित्र या रेखांक, जिसको साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाने का आशय हो या जो उपयोग में लाया जा सके, दस्तावेज है।
  • (ङ) जिस लेख में निर्देश या अनुदेश अन्तर्विष्ट हो, वह दस्तावेज है;

स्पष्टीकरण 2- अक्षरों, अंको या चिह्नों से जो कुछ भी वाणिज्यिक या अन्य प्रथा के अनुसार व्याख्या करने पर अभिव्यक्त होता है, वह इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत ऐसे अक्षरों, अंको या चिह्नों से अभिव्यक्त हुआ समझा जाएगा, चाहे वह वस्तुतः अभिव्यक्त न भी किया गया हो।

दृष्टांत- एक विनिमयपत्र की पीठ पर, जो उसके आदेश के अनुसार देय है, अपना नाम लिख देता है। वाणिज्यिक प्रथा के अनुसार व्याख्या करने पर इस पृष्ठांकन का अर्थ है कि धारक को विनिमयपत्र का भुगतान कर दिया जाए। पृष्ठांकन दस्तावेज है और इसका अर्थ उसी प्रकार से लगाया जाना चाहिए मानो हस्ताक्षर के ऊपर “धारक को भुगतान करो” शब्द या तत्प्रभाव वाले शब्द लिख दिए गए हो।

(8) “कपटपूर्वक”- कोई व्यक्ति किसी बात को कपटपूर्वक करता है, यह कहा जाता है, यदि वह उस बात को कपट करने के आशय से करता है, अन्यथा नहीं ।

(9) लिंग-पुल्लिंग वाचक शब्द जहां प्रयोग किए गए हैं, वे हर व्यक्ति के बारे में लागू हैं, चाहे नर हो या नारी।

स्पष्टीकरण- “ट्रांसजेंडर का वह अर्थ होगा, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा (2) के खंड (ट) में है,

(10) “सद्भावपूर्वक” कोई बात “सद्भावपूर्वक” की गई या विश्वास की गई नहीं कही जाती जो सम्यक् सतर्कता और ध्यान के बिना की गई या विश्वास की गई हो,

(11) ‘सरकार’ केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य की सरकार का द्योतक है;

(12) “संश्रय”- धारा 187 की उपधारा (7) में के सिवाय और धारा 191 की उपधारा (1) में वहां के सिवाय, जहां संभय संचित व्यक्ति की पत्नी या पति द्वारा दिया गया हो, “संश्रय” शब्द के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को आश्रय, भोजन, पेय, धन, वस्त्र, आयुध, गोलाबारूद या प्रवहण के साधन देना, या किन्हीं साधनों से चाहे वे उसी प्रकार के हो या नहीं, जिस प्रकार के इस धारा में परिगणित हैं किसी व्यक्ति की सहायता पकड़े जाने से बचने के लिए करना, आता है;

(13) “क्षति” शब्द किसी प्रकार की अपहानि का द्योतक है, जो किसी व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति या सम्पत्ति को अवैध रूप से कारित हुई हो;

(14) “अवैध” करने के लिए वैध रूप से आबद्ध “अवैध” शब्द हर उस बात को लागू है, जो अपराध हो, या जो विधि द्वारा प्रतिषिद्ध हो, या जो सिविल कार्यवाही के लिए आधार उत्पन्न करती हो, और कोई व्यक्ति उस बात को “करने के लिए वैध रूप से आबद्ध” कहा जाता है जिसका लोप करना उसके लिए अवैध है;

(15) न्यायाधीश- “न्यायाधीश” शब्द न केवल हर ऐसे व्यक्ति का द्योतक है, जो पद रूप से न्यायाधीश अभिहित हो, किन्तु उस हर व्यक्ति का भी द्योतक है.-

  • (i) जो किसी विधि कार्यवाही में, चाहे वह सिविल हो या दाण्डिक, अन्तिमः निर्णय या ऐसा निर्णय, जो उसके विरुद्ध अपील न होने पर अन्तिम हो जाए या ऐसा निर्णय, जो किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा पुष्ट किए जाने पर अन्तिम हो जाए, देने के लिए, विधि द्वारा सशक्त किया गया हो, अथवा
  • (ii) जो उस व्यक्ति निकाय में से एक हो, जो व्यक्ति निकाय ऐसा निर्णय देने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो।

दृष्टांत- किसी आरोप के संबंध में, जिसके लिए उसे जुर्माना या कारावास का दण्ड देने की शक्ति प्राप्त है, चाहे उसकी अपील होती हो या न होती हो, अधिकारिता का प्रयोग करने वाला मजिस्ट्रेट न्यायाधीश है।

(16) “जीवन”- जब तक संदर्भ से तत्प्रतिकूल प्रतीत न हो, “जीवन” शब्द मानव के जीवन का अभिप्रेत है;

(17) “स्थानीय विधि”- स्थानीय विधि वह विधि है जो भारत के किसी विशिष्ट भाग को ही लागू हो;

(18) “पुरुष”- पुरुष शब्द किसी भी आयु के मानव नर अभिप्रेत है;

(19) “मानसिक रुग्णता” का वह अर्थ होगा जो मानसिक स्वास्थ्य लाभ अधिनियम, 2017 की धारा 2 के खंड (क) में है;

(20) “मास” और “वर्ष”- जहां कहीं ‘वर्ष’ शब्द या ‘मास’ शब्द का प्रयोग किया गया है वहां यह समझा जाना है कि वर्ष या मास की गणना ब्रिटिश कलेंडर के अनुकूल की जानी है;

(21) “जंगम सम्पति”- जंगम सम्पति शब्दों से यह आशयित है कि इनके अन्तर्गत हर भांति की मूर्त सम्पति आती है, किन्तु भूमि और वे चीजें, जो भू-बद्ध हो या भू-बद्ध किसी चीज से स्थायी रूप से जकड़ी हुई हो, इनके अन्तर्गत नहीं आती;

(22) “वचन”- जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल प्रतीत न हो, एकवचन अभिप्रेत शब्दों के अन्तर्गत बहुवचन आता है, और बहुवचन अभिप्रेत शब्दों के अन्तर्गत एकवचन आता है;

(23) “शपथ” – शपथ के लिए विधि द्वारा प्रतिस्थापित सत्यनिष्ठ प्रतिज्ञान और ऐसी कोई घोषणा जिसका किसी लोक सेवक के समक्ष किया जाना या न्यायालय में या अन्यथा सबूत के प्रयोजन के लिए उपयोग किया जाना विधि द्वारा अपेक्षित या प्राधिकृत हो, “शपथ” शब्द के अन्तर्गत आती है;

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(24) “अपराध”- इस खण्ड के उपखंड (क) और उपखंड (ख) में वर्णित अध्याय और धाराओं में के सिवाय, “अपराध’ शब्द से इस संहिता द्वारा दण्डनीय की गई कोई बात अभिप्रेत है, किंतु-

  • (क) अध्याय 3 और निम्नलिखित धाराओं, अर्थात् धारा 8 की उपधारा (2), (3), (4), (5), धारा 8, 48, 49, 51, 53, 54, 55, 56, 57, 58, 59, 61, 219, 227, 228, 237, 245, 247, 248, 256, 257, 258, 259, 260, 115(1), 119, 115(2), 116(1), 116(2), 123(7), 123(8), 305(7), 305(6) और 327 (2) में “अपराध” शब्द से इस संहिता के अधीन, या एत्स्मिनपश्चात् यथापरिभाषित विशेष या स्थानीय विधि के अधीन दण्डनीय बात अभिप्रेत है; और
  • (ख) धारा 185 (1) 208, 209, 235, 236, 246, 250 और 326 (1) में “अपराध” शब्द का अर्थ उस दशा में वही है जिसमें कि विशेष या स्थानीय विधि के अधीन दण्डनीय बात ऐसी विधि के अधीन छह मास या उससे अधिक अवधि के कारावास से, चाहे वह जुर्माने सहित या रहित, दण्डनीय हो;

(25) “लोप”- शब्द लोपावली से वह अभिप्रेत है उसी प्रकार है जिस प्रकार का लोप का;

(26) “व्यक्ति”- कोई भी कंपनी या संगम, या व्यक्ति निकाय चाहे वह निगमित हो या नहीं, “व्यक्ति” शब्द के अन्तर्गत आता है;

(27) लोक-लोक का कोई भी वर्ग या कोई भी समुदाय “लोक” शब्द के अन्तर्गत आता है;

(28) “लोक सेवक”- लोक सेवक शब्द उस व्यक्ति के द्योतक है, जो एतस्मिन् पश्चात् निम्नगत वर्णनों में से किसी में आता है, अर्थात्:-

  • (क) भारत की सेना, नौसेना या वायु सेना का हर आयुक्त आफिसर;
  • (ख) हर न्यायाधीश जिसके अन्तर्गत ऐसा कोई भी व्यक्ति आता है जो किन्हीं न्यायनिर्णायक कृत्यों का चाहे स्वयं या व्यक्तियों के किसी निकाय के सदस्य के रूप में निर्वहन करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो;
  • (ग) न्यायालय का हर आफिसर (जिसके अन्तर्गत समापक, रिसीवर या कमिश्नर आता है) जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह विधि या तथ्य के किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे, या कोई दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे या रखे या किसी सम्पति का भार सम्भाले या उस सम्पति का व्ययन करे, या किसी न्यायिक आदेशिका का निष्पादन करे या कोई शपथ ग्रहण कराए या निर्वचन करे, या न्यायालय में व्यवस्था बनाए रखे और हर व्यक्ति, जिसे ऐसे कर्तव्यों में से किन्हीं का पालन करने का प्राधिकार न्यायालय द्वारा विशेष रूप से दिया गया हो;
  • (घ) किसी न्यायालय या लोक सेवक की सहायता करने वाला हर असेसर या पंचायत का सदस्य;
  • (ङ) हर मध्यस्थ या अन्य व्यक्ति, जिसको किसी न्यायालय द्वारा या किसी अन्य सक्षम लोक प्राधिकारी द्वारा कोई मामला या विषय, विनिश्चय या रिपोर्ट के लिए निर्देशित किया गया हो;
  • (च) हर व्यक्ति जो किसी ऐसे पद को धारण करता हो, जिसके आधार से वह किसी व्यक्ति को परिरोध में करने या रखने के लिए सशक्त हो;
  • (छ) सरकार का हर आफिसर जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह अपराधों का निवारण करें, अपराधों की इतिला दे, अपराधियों को न्याय के लिए उपस्थित करे, या लोक के स्वास्थ्य, क्षेम या सुविधा की संरक्षा करे;
  • (ज) हर आफिसर जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह सरकार की ओर से किसी सम्पति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे या व्यय करे, या सरकार की और से कोई सर्वेक्षण, निर्धारण या संविदा करे, या किसी राजस्व आदेशिका का निष्पादन करे या सरकार के धन-संबंधी हितों पर प्रभाव डालने वाले किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे या सरकार के धन संबंधी हितों से संबंधित किसी दस्तावेज को बनाए अधिप्रमाणीकृत करे या रखे, या सरकार के धन-संबंधी हितों की संरक्षा के लिए किसी विधि के व्यतिक्रम को रोके;
  • (झ) हर आफिसर, जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह किसी ग्राम, नगर या जिले के किसी धर्मनिरपेक्ष सामान्य प्रयोजन के लिए किसी सम्पति को ग्रहण करे, प्राप्त करे रखे या व्यय करे कोई सर्वेक्षण या निर्धारण करे, या कोई रेट या कर उद्गृहीत करे या किसी ग्राम, नगर या जिले के लोगों के अधिकारों के अभिनिश्चयन के लिए कोई दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे या रखे;
  • (ञ) हर व्यक्ति जो कोई ऐसा पद धारण करता हो जिसके आधार से वह निर्वाचक नामावली तैयार करने, प्रकाशित करने, बनाए रखने, या पुनरीक्षित करने के लिए या निर्वाचन या निर्वाचन के किसी भाग को संचालित करने के लिए सशक्त हो;
  • (ट) हर व्यक्ति, जो-
  • (i) सरकार की सेवा या वेतन में हो, या किसी लोक कर्तव्य के पालन के लिए सरकार से फीस या कमीशन के रूप में पारिश्रमिक पाता हो;
  • (ii) साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 3 के खंड (31) में यथा परिभाषित किसी स्थानीय प्राधिकारी की किसी केन्द्रीय अधिनियम या राज्य अधिनियम के द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी निगम की अथवा कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 के खंड (45) में यथा परिभाषित किसी कम्पनी की सेवा या वेतन में हो।

स्पष्टीकरण-

  • (क) ऊपर के वर्णनों में से किसी में आने वाले व्यक्ति लोक सेवक हैं, चाहे वे सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हो या नहीं।
  • (ख) वे उस हर व्यक्ति के संबंध में समझे जाएंगे जो लोक सेवक के ओहदे को वास्तव में धारण किए हुए हो, चाहे उस ओहदे को धारण करने के उसके अधिकार में कैसी ही विधिक त्रुटि हो।
  • (ग) निर्वाचन शब्द ऐसे किसी विधायी, नगरपालिक या अन्य लोक प्राधिकारी के नाते, चाहे वह कैसे ही स्वरूप का हो, सदस्यों के वरणार्य निर्वाचन का द्योतक है जिसके लिए वरण करने की पद्धति किसी विधि के द्वारा या अधीन निर्वाचन के रूप में विहित की गई हो।

दृष्टांत- नगरपालिका आयुक्त लोक सेवक है।

(29) “विश्वास करने का कारण” कोई व्यक्ति किसी बात के “विश्वास करने का कारण रखता है, यह तब कहा जाता है जब वह उस बात के विश्वास करने का पर्याप्त हेतुक रखता है, अन्यथा नहीं;

(30) “विशेष विधि” वह विधि है जो किसी विशिष्ट विषय को लागू हो;

(31) “मूल्यवान प्रतिभूति” शब्द उस दस्तावेज अभिप्रेत है जो ऐसी दस्तावेज है, या होनी तात्पर्यित है, जिसके द्वारा कोई विधिक अधिकार सृजित विस्तृत, अन्तरित, निर्बन्धित निर्वाचित किया जाए, छोड़ा जाए या जिसके द्वारा कोई व्यक्ति यह अभिस्वीकार करता है कि वह विधिक दायित्व के अधीन है, या अमुक विधिक अधिकार नहीं रखता है।

दृष्टांत- एक विनिमयपत्र की पीठ पर अपना नाम लिख देता है इस पृष्ठांकन का प्रभाव किसी व्यक्ति को, जो उसका विधिपूर्ण धारक हो जाए, उस विनिमयपत्र पर का अधिकार अन्तरित किया जाना है, इसलिए यह पृष्ठांकन “मूल्यवान प्रतिभूति” है;

(32) “जलयान” शब्द किसी चीज़ अभिप्रेत हैं, जो मानवों के या सम्पति के जल द्वारा प्रवहण के लिए बनाई गई हो,

(33) “स्वेच्छया” कोई व्यक्ति किसी परिणाम को “स्वेच्छया” कारित करता है, यह तब कहा जाता है, जब वह उसे इन साधनों द्वारा कारित करता है, जिनके द्वारा उसे कारित करना उसका आशय था या उन साधनों द्वारा कारित करता है जिन साधनों को काम में लाते समय वह यह जानता था, या यह विश्वास करने का कारण रखता था कि उनसे उसका कारित होना संभाव्य है;

दृष्टांत- लूट को सुकर बनाने के प्रयोजन से एक बड़े नगर के एक बसे हुए गृह में रात को आग लगाता है और इस प्रकार एक व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है। यहां क का आशय भले ही मृत्यु कारित करने का न रहा हो और वह दुखित भी हो कि उसके कार्य से मृत्यु कारित हुई है तो भी यदि वह यह जानता था कि संभाव्य है कि वह मृत्यु कारित कर दे तो उसने स्वेच्छया मृत्यु कारित की है;

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(34) “बिल” शब्द किसी भी वसीयती दस्तावेज अभिप्रेत है;

(35) “स्त्री” शब्द किसी भी आयु की मानव नारी अभिप्रेत है;

(36) “सदोष अभिलाभ” विधिविरुद्ध साधनों द्वारा ऐसी सम्पति का अभिलाभ है, जिसका वैध रूप से हकदार अभिलाभ प्राप्त करने वाला व्यक्ति न हो;

(37) “सदोष हानि” विधिविरुद्ध साधनों द्वारा ऐसी सम्पति की हानि है, जिसका वैध रूप से हकदार हानि उठाने वाला व्यक्ति हो;

(38) “सदोष अभिलाभ प्राप्त करना” सदोष हानि उठाना कोई व्यक्ति सदोष अभिलाभ प्राप्त करता है, यह तब कहा जाता है जब कि वह व्यक्ति सदोष रखे रखता है और तब भी जबकि वह सदोष अर्जन करता है। कोई व्यक्ति सदोष हानि उठाता है, यह तब कहा जाता है जब कि उसे किसी सम्पति से सदोष अलग रखा जाता है और तब भी जबकि उसे किसी सम्पति से सदोष वंचित किया जाता है;

(39) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किन्तु भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में परिभाषित हैं वहीं अर्थ होंगे जो क्रमशः उस अधिनियम में हैं।

Bharatiya Nyaya Sanhita 2 in English – BNS 2 in English

In this Sanhita unless the context otherwise requires,–

(1) “act” as well a series of acts as a single act;

(2) “animal” means any living creature, other than a human being;

(3) “counterfeit”.- A person is said to “counterfeit” who causes one thing to resemble another thing, intending by means of that resemblance to practice deception, or knowing it to be likely that deception will thereby be proctised.

Explanation 1- It is not essential to counterfeiting that the imitation should be exact.

Explanation 2- When a person causes one thing to resemble another thing, and the resemblance is such that a person might be deceived thereby, it shall be presumed, until the contrary is proved, that the person so causing the one thing to resemble the other thing intended by means of that resemblance to practise deception or knew it to be likely that deception would thereby be practised;

(4) “Court” means a Judge who is empowered by law to act judicially alone, or a body of Judges, which is empowered by law to act judicially as a body, when such Judge or body of Judges is acting judicially;

(5) “death” means the death of a human being unless the contrary appears from the context;

(6) “dishonestly” means doing of an act with the intention of causing wrongful gain to one person or wrongful loss to another person;

(7) “document” means any matter expressed or described upon any substance by means of letters, figures or marks, or by more than one of those means, intended to be used, or which may be used, as evidence of that matter.

Explanation 1- It is immaterial by what means or upon what substance the letters, figures or marks are formed, or whether the evidence is intended for, or may be used in a Court or not.

Illustrations.

  • (a) A writing expressing the terms of a contract, which may be used as evidence of the contract, is a document.
  • (b) A cheque upon a banker is a document.
  • (c) A power-of-attorney is a document.
  • (d) A Map or plan which is intended to be used or which may be used as evidence, is a document.
  • (e) A writing containing directions or instructions is a document.

Explanation 2- Whatever is expressed by means of letters, figures or marks as explained by mercantile or other usage, shall be deemed to be expressed by such letters, figures or marks within the meaning of this section, although the same may not be actually expressed.

Illustration- A writes his name on the back of a bill of exchange payable to his order. The meaning of the endorsement, as explained by mercantile usage, is that the bill is to be paid to the holder. The endorsement is a document, and shall be construed in the same manner as if the words “pay to the holder” or words to that effect had been written over the signature.

(8) “fraudulently”– A person is said to do a thing fraudulently if he does that thing with intent to defraud but not otherwise.

(9) “gender”- the pronoun “he” and its derivatives are used of any person, whether male, female or transgender.

Explanation.- “transgender” shall have the meaning assigned to it in clause (k) of section 2 of the Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019;

(10) “good faith”—Nothing is said to be done or believed in “good faith” which is done or believed without due care and attention;

(11) “Government” means the Central Government or a State Government;

(12) “harbour”- except as otherwise provided in this Sanhita, includes the supplying a person with shelter, food, drink, money, clothes, arms, ammunition or means of conveyance, or the assisting a person by any means, whether of the same kind as those enumerated in this section or not, to evade apprehension;

(13) “injury” means any harm whatever illegally caused to any person, in body, mind, reputation or property;

(14) “illegal”- “legally bound to do”- The word “illegal” is applicable to everything which is an offence or which is prohibited by law, or which furnishes ground for a civil action; and a person is said to be “legally bound to do” whatever it is illegal in him to omit;

(15) “Judge” means a person who is officially designated as a Judge and includes a person,–

(i) who is empowered by law to give, in any legal proceeding, civil or criminal, a definitive judgment, or a judgment which, if not appealed against, would be definitive, or a judgment which, if confirmed by some other authority, would be definitive; or

(ii) who is one of a body or persons, which body of persons is empowered by law to give such a judgment.

llustration- A Magistrate exercising jurisdiction in respect of a charge on which he has power to sentence to fine or imprisonment, with or without appeal, is a Judge;

(16) “life” means the life of a human being, unless the contrary appears from the context;

(17) “local law” means a law applicable only to a particular part of India;

(18) “man” means male human being of any age;

(19) “mental illness” shall have the meaning assigned to it in clause (a) of section 2 of the Mental Healthcare Act, 2017;

(20) “month” and “year”- Wherever the word “month” or the word “year” is used, it is to be understood that the month or the year is to be reckoned according to the Gregorian calendar;

(21) “movable property” includes property of every description, except land and things attached to the earth or permanently fastened to anything which is attached to the earth;

(22) “number”- Unless the contrary appears from the context, words importing the singular number include the plural number, and words importing the plural number include the singular number;

(23) “oath” includes a solemn affirmation substituted by law for an oath, and any declaration required or authorised by law to be made before a public servant or to be used for the purpose of proof, whether in a Court or not;

(24) “offence”- Except in the Chapters and sections mentioned in sub-clauses (a) and (b) the word “offence” means an act made punishable by this Sanhita, but–

  • (a) in Chapter III and in the following sections, namely, sub-sections (2), (3), (4) and (5) of section 8, sections 10, 46, 47, 48, 51, 53, 54, 55, 56, 57, 61, 113, 114, 117, sub-sections (7) and (8) of section 125, 217, 224, 225, 234, 242, 244, 245, 253, 254, 255, 256, 257, sub-sections (6) and (7) of section 306 and clause (b) of section 324, the word “offence” means a thing punishable under this Sanhita, or under any special law or local law; and
  • (b) in sections 183, 205, 206, 232, 233, 243, 247 and 323 the word “offence” shall have the same meaning when the act punishable under the special law or local law is punishable under such law with imprisonment for a term of six months or more, whether with or without fine;
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(25) “omission” means sigle ommission as well as a series of omissions;

(26) “person” includes any company or association or body of persons, whether incorporated or not;

(27) “public” includes any class of the public or any community;

(28) “public servant” means a person falling under any of the descriptions, namely:-

  • (a) every commissioned officer in the Army, Navy or Air Force;
  • (b) every Judge including any person empowered by law to discharge, whether by himself or as a member of any body of persons, any adjudicatory functions;
  • (c) every officer including a liquidator, receiver or commissioner whose duty it is, as such officer, to investigate or report on any matter of law or fact, or to make, authenticate, or keep any document, or to take charge or dispose of any property, or to execute any judicial process, or to administer any oath, or to interpret, or to preserve order in the Court, and every person specially authorised to perform any of such duties;
  • (d) every assessor or member of a panchayat assisting a Court or public servant;
  • (e) every arbitrator or other person to whom any cause or matter has been referred for decision or report by any Court, or by any other competent public authority;
  • (f) every person who holds any office by virtue of which he is empowered to place or keep any person in confinement;
  • (g) every officer of the Government whose duty it is, as such officer, to prevent offences, to give information of offences, to bring offenders to justice, or to protect the public health, safety or convenience;
  • (h) every officer whose duty it is as such officer, to take, receive, keep or expend any property on behalf of the Government, or to make any survey, assessment or contract on behalf of the Government, or to execute any revenue process, or to investigate, or to report, on any matter affecting the pecuniary interests of the Government, or to make, authenticate or keep any document relating to the pecuniary interests of the Government, or to prevent the infraction of any law for the protection of the pecuniary interests of the Government;
  • (i) every officer whose duty it is, as such officer, to take, receive, keep or expend any property, to make any survey or assessment or to levy any rate or tax for any secular common purpose of any village, town or district, or to make, authenticate or keep any document for the ascertaining of the rights of the people of any village, town or district;
  • (j) every person who holds any office by virtue of which he is empowered to prepare, publish, maintain or revise an electoral roll or to conduct an election or part of an election;
  • (i) in the service or pay of the Government or remunerated by fees or commission for the performance of any public duty by the Government;
  • (ii) in the service or pay of a local authority as defined in clause (31) of section 3 of the General Clauses Act, 1897, a corporation established by or under a Central or State Act or a Government company as defined in clause (45) of section 2 of the Companies Act, 2013.

Explanation-

  • (a) persons falling under any of the descriptions made in this clause are public servants, whether appointed by the Government or not;
  • (b) every person who is in actual possession of the situation of a public servant, whatever legal defect there may be in his right to hold that situation is a public servant;
  • (c) “election” means an election for the purpose of selecting members of any legislative, municipal or other public authority, of whatever character, the method of election to which is by, or under any law for the time being in force.

Illustration- A Municipal Commissioner is a public servant;

(29) “reason to believe”- A person is said to have “reason to believe” a thing, if he has sufficient cause to believe that thing but not otherwise;

(30) “special law” means a law applicable to a particular subject;

(31) “valuable security” means a document which is, or purports to be, a document where by any legal right is created, extended, transferred, restricted, extinguished or released, or where by any person acknowledges that he lies under legal liability, or has not a certain legal right.

Illustration- A writes his name on the back of a bill of exchange. As the effect of this endorsement is to transfer the right to the bill to any person who may become the lawful holder of it, the endorsement is a “valuable security”;

(32) “vessel” means anything made for the conveyance by water of human beings or of property;

(33) “voluntarily” A person is said to cause an effect “voluntarily” when he causes it by means whereby he intended to cause it, or by means which, at the time of employing those means, he knew or had reason to believe to be likely to cause it.

Illustration.

A sets fire, by night, to an inhabited house in a large town, for the purpose of facilitating a robbery and thus causes the death of a person. Here, A may not have intended to cause death; and may even be sorry that death has been caused by his act; yet, if he knew that he was likely to cause death, he has caused death voluntarily;

(34) “will” means any testamentary document;

(35) “woman” means a female human being of any age;

(36) “wrongful gain” means gain by unlawful means of property to which the person gaining is not legally entitled;

(37) “wrongful loss” means the loss by unlawful means of property to which the person losing it is legally entitled;

(38) “gaining wrongfully”, “losing wrongfully”- A person is said to gain wrongfully when such person retains wrongfully, as well as when such person acquires wrongfully. A person is said to lose wrongfully when such person is wrongfully kept out of any property, as well as when such person is wrongfully deprived of property; and

(39) words and expressions used but not defined in this Sanhita but defined in the Information Technology Act, 2000 and the Bhartiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 and shall have the meanings respectively assigned to them in that Act Sanhita.

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