भारतीय न्याय संहिता 109 क्या है? – Bharatiya Nyaya Sanhita 109 in Hindi & English

Bharatiya Nyaya Sanhita 109 in Hindi – BNS 109 in Hindi

संगठित अपराध- (1) या तो किसी संगठित अपराध अभिषद् के सदस्य के रूप में या ऐसे अभिषद् की ओर से मिलकर, एकल रूप से या संयुक्त रूप से कार्य करने वाले व्यष्टियों के समूहों के प्रयास दद्वारा, हिंसा, हिंसा की धमकी, अभित्रास, उत्पीडन, भ्रष्टाचार या संबंधित क्रियाकलाप या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तात्विक फायदा जिसके अंतर्गत वित्तीय फायदा भी है प्राप्त करने के लिए अन्य विधिविरुद्ध साधनों के प्रयोग द्वारा कोई सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप, जिसके अंतर्गत व्यपहरण, डकैती, यान चोरी, उद्दापन, भूमि हथियाना, संविदा वध, आर्थिक अपराध, गंभीर परिणाम वाले साइबर अपराध, लोगों, ओषधियों, अवैध माल या सेवाओं और हथियारों का दुर्व्यापार, वेश्यावृत्ति या फिरौती के लिए मानव दुर्व्यपार घेरा भी है, संगठित अपराध का गठन करेगा।

स्पष्टीकरण- इस खंड के प्रयोजनों के लिए-

  • (i) “फायदा” में संपति, अभिलाभ, सेवा, मनोरंजन, संपति या सुविधाओं का उपयोग या उन तक पहुँच, और किसी व्यक्ति के फायदे की कोई चीज चाहे उसका कोई अंतर्निहित या मूर्त मूल्य, प्रयोजन या विशेषता हो या नहीं, सम्मिलित है।
  • (ii) “संगठित अपराध अभिषद्” से तीन या अधिक व्यक्तियों का आपराधिक संगठन या समूह अभिप्रेत है जो एक अभिषद्, टोली, माफिया या (अपराध) घेरे के रूप में या तो अकेले या सामूहिक रूप से मिलकर एक या अधिक गंभीर अपराधों को करने मैं लगे हुए हैं या टोली बनाकर अपराध, घेराबंदी या संगठित अभिषदित अपराधों में अंतवलित है।
  • (iii) “सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप” विधि द्वारा प्रतिषिद्ध क्रियाकलाप अभिप्रेत हैं, जो किसी संगठित अपराध अभिषद के सदस्य के रूप में या तो अकेले या संयुक्त रूप से किए जाने वाला संदेय अपराध है, जिसकी बाबत दस वर्ष की पूर्ववर्ती अवधि के भीतर सक्षम न्यायालय के समक्ष एक से अधिक आरोप पत्र फाइल किए गए हैं और उस न्यायालय ने ऐसे अपराध का संज्ञान लिया है;
  • (iv) “आर्थिक अपराध” में आपराधिक न्यास भंग, कूटरचना, करेंसी और मूल्यवान प्रतिभूतियों का कूटकरण, वित्तीय घोटाले, पोंजी स्कीम चलाना, मास मार्केटिंग कपट, धनीय फायदा प्राप्त करने के लिए बहुसंख्या में लोगों के साथ कपट करने की दृष्टि से बहुस्तरीय मार्केटिंग स्कीमें या किसी भी रूप में बड़े पैमाने पर संगठित बाजी लगाना, धनशोधन और हवाला संव्यवहारों के अपराध, सम्मिलित है;

(2) जो कोई संगठित अपराध कारित करेगा या कारित करने का प्रयास करेगा-

  • (i) यदि ऐसे अपराध के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती हैं, तो वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडित होगा और और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो दस लाख रुपए से कम नहीं होगा;
  • (ii) अन्य मामलों में, वह ऐसी अवधि के कारावास से दंडनीय होगा, जो पांच वर्ष से कम नहीं होगा किंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो पांच लाख रुपए से कम नहीं होगा।
See also  भारतीय न्याय संहिता 7 क्या है? - Bharatiya Nyaya Sanhita 7 in Hindi & English

(3) जो कोई संगठित अपराध किए जाने का षडयंत्र करता है या उसका संचालन करता है, या उसमें सहायता करता है, उसे सुकर बनाता है या संगठित अपराध के किसी प्रारंभिक कार्य में अन्यया नियोजित होता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दंडनीय होगा, जो पांच वर्ष से कम नहीं होगा किंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो पांच लाख रुपए से कम नहीं होगा;

(4) कोई व्यक्ति जो संगठित अपराध अभिषद का सदस्य है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दंडनीय होगा, जो पांच वर्ष से कम नहीं होगा किंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो पांच लाख रुपए से कम नहीं होगा;

(5) जो कोई आशयपूर्वक किसी व्यक्ति जिसने संगठित अपराध कारित किया है या जो संगठित अपराध अभिषद का सदस्य है, को संश्रय देता है या छिपाता है अथवा संश्रय देने या छिपाने में सहायता करता है या उसे विश्वास है कि उसका कार्य ऐसे अपराध को प्रोत्साहित करेगा या उसे करने में सहायता करेगा, वह ऐसी अवधि के कारावास से दंडनीय होगा, जो तीन वर्ष से कम नहीं होगा किंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो पांच लाख रूपए से कम नहीं होगा;
परंतु यह उपधारा उस दशा में लागू नहीं होगी, जिसमें संश्रय या छिपाना अपराधी के पति-पत्नी द्वारा किया जाता है।

(6) जो कोई संगठित अपराध से व्यत्पुन्न या प्राप्त किसी संपति या किसी संगठित अपराध के आगमों या जो संगठित अपराध परिषदों की निधियों के माध्यम से अर्जित की गई है, को धारण करता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दंडनीय होगा, जो तीन वर्ष से कम नहीं होगा किंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो दो लाख रुपए से कम नहीं होगा;

(7) यदि कोई व्यक्ति संगठित अपराध अभिषद् के सदस्य की ओर से या किसी समय किसी जंगम या स्थावर संपत्ति को धारण करता है, जिसका वह समाधानप्रद लेखा नहीं दे सका है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दंडनीय होगा, जो तीन वर्ष से कम नहीं होगा किंतु दस वर्ष तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो एक लाख रुपए से कम नहीं होगा और ऐसी संपत्ति जब्ती और संपहण के लिए भी दायी होगी।

स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “संगठित अपराध के आगम” से सभी प्रकार की संपत्तियां अभिप्रेत हैं, जो किसी संगठित अपराध के कारित किए जाने से व्यतपुन्न या अभिप्राप्त की गई हैं अथवा किसी संगठित अपराध की खोजयोग्य निधियों के माध्यम से अर्जित की गई है और उसमें उन व्यक्तियों पर ध्यान दिए बिना, जिनके नाम ऐसे आगम है या जिनके कब्जे में वह पाया गया है, नकद सम्मिलित है।

See also  भारतीय न्याय संहिता 79 क्या है? - Bharatiya Nyaya Sanhita 79 in Hindi & English

Bharatiya Nyaya Sanhita 109 in English – BNS 109 in English

Organised crime- (1) Any continuing unlawful activity including kidnapping, robbery, vehicle theft,extortion, land grabbing, contract killing, economic offences, cyber-crimes having severe consequences, trafficking in people, drugs, illicit goods or services and weapons, human trafficking racket for prostitution or ransom by the effort of groups of individuals acting in concert, singly or jointly, either as a member of an organised crime syndicate or on behalf of such syndicate, by use of violence, threat of violence, intimidation, coercion, corruption or related activities or other unlawful means to obtain direct or indirect, material benefit including a financial benefit, shall constitute organised crime.

Explanation- For the purposes of this sub-section,-

  • (i) ‘‘benefit’’ includes property, advantage, service, entertainment, the use of or access to property or facilities, and anything of benefit to a person whether or not it has any inherent or tangible value, purpose or attribute;
  • (ii) “organised crime syndicate” means a criminal organisation or group of three or more persons who, acting either singly or collectively in concert, as a syndicate,gang, mafia, or (crime) ring indulging in commission of one or more serious offences or involved in gang criminality, racketeering, and syndicated organised crime;
  • (iii) “continuing unlawful activity” means an activity prohibited by law, which is a cognizable offence undertaken either singly or jointly, as a member of an organised crime syndicate or on behalf of such syndicate in respect of which more than one charge-sheets have been filed before a competent court within the preceding period often years and that court has taken cognizance of such offence;
  • (iv) “economic offences” include criminal breach of trust; forgery, counterfeiting of currency and valuable securities, financial scams, running Ponzi schemes, mass-marketing fraud or multi-level marketing schemes with a view to defraud the people at large for obtaining the monetary benefits or large scale organised betting in any form, offences of money laundering and hawala transactions.

(2) Whoever, attempts to commit or commits an offence of organised crime shall,-

  • (i) if such offence has resulted in the death of any person, be punishable with death or imprisonment for life and shall also be liable to fine which shall not be less than rupees ten lakhs;
  • (ii) in any other case, be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than five years but which may extend to imprisonment for life and shall also beliable to fine which shall not be less than rupees five lakhs.

(3) Whoever, conspires or organises the commission of an organised crime, or assists,facilitates or otherwise engages in any act preparatory to an organised crime, shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than five years but which may extend to imprisonment for life and shall also be liable to fine which shall not be less than rupees five lakhs.

See also  भारतीय न्याय संहिता 36 क्या है? - Bharatiya Nyaya Sanhita 36 in Hindi & English

(4) Any person who is a member of an organised crime syndicate shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than five years but which may extend to imprisonment for life and shall also be liable to fine which shall not be less than rupees five lakhs.

(5) Whoever, intentionally harbours or conceals or attempts to harbour or conceal any person who has committed the offence of an organised crime or any member of an organised crime syndicate or believes that his act will encourage or assist the doing of such crime shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than three years but which may extend to imprisonment for life and shall also be liable to fine which shall not be less than rupees five lakhs: Provided that this sub-section shall not apply to any case in which the harbour or concealment is by the spouse of the offender.

(6) Whoever, holds any property derived, or obtained from the commission of an organised crime or proceeds of any organised crime or which has been acquired through the organised crime syndicate funds shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than three years but which may extend to imprisonment for life and shall also be liable to fine which shall not be less than rupees two lakhs.

(7) If any person on behalf of a member of an organised crime syndicate is, or at anytime has been in possession of movable or immovable property which he cannot satisfactorily account for, shall be punishable with imprisonment for a term which shall not be less than three years but which may extend to imprisonment for ten years and shall also be liable to fine which shall not be less than rupees one lakh and such property shall also be liable for attachment and forfeiture.

Explanation- For the purposes of this section, “proceeds of any organised crime” means all kind of properties which have been derived or obtained from commission of any organised crime or have acquired through funds traceable to any organised crime and shall include cash, irrespective of person in whose name such proceeds are standing or in whose possession they are found.

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